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"मोबाइल प्लान की प्लानिंग"
विवेक रंजन श्रीवास्तव
jabalpur (mp) india
मै सदा से परिर्वतन का समर्थक रहा हूँ .मेरा विश्वास है कि समय से तालमेल बैठा कर चलना प्रगतिशील होने की पहचान है . अपने इसी ध्येय की प्राप्ति हेतु और कुछ बीबी, बच्चों की फरमाईश पर, नितांत अनावश्यक होते हुये भी मैने एक मोबाइल फोन खरीद लिया . अब यह आवश्यक हो गया कि मै किसी कंपनी की एक सिम खरीद कर , किसी प्लान विशेष को चुनकर , मोबाइल हो जाऊँ ."जागो ग्राहक जागो॔" की अलख सुन , अपने पढ़े लिखे होने का परिचय देते हुये एक जागरूख उपभोक्ता की तरह, मै किस कंपनी का कौन सा प्लान चुनुं इस अनुसंधान में जुट गया . समय की दौड़ में सरकारी विभाग से लिमिटेड कंपनी में परिर्वतित कंपनी सहित चार पाँच निजी कंपनियों के प्रिपेड एवं पोस्ट पेड प्लान्स के ब्रोशर्स शहर भर में घूम घूम कर एकत्रित किये , मेरे उत्साही बेटे ने इंटरनेट से भी काफी सारी जानकारी डाउनलोड कर प्रिंट रूप में सुलभ कर दी ,जी पी आर एस एवं सी डी एम तकनीक की वैकल्पिक प्रणालियों में से एक का चयन करना था फिर हमें निर्णय लेना था कि हम किस मोबाइल सेवा के कैसे उपभोक्ता बनें? कोई कुछ आफर कर रहा था तो कोई कुछ और प्रलोभन दे रहा था .कहीं सिम खरीदते ही फ्री गिफ्ट थी , तो कहीं तारीख विशेष तक छूट का आकर्षण .किसी की रोमिंग इनकमिंग कम थी तो किसी की आउटगोइंग . मोबाइल से मोबाइल,मोबाइल से डब्लू एल एल ,मोबाइल से फिक्स्ड लाइन सबकी काल दरें बिल्कुल अलग अलग थीं . अपने ही टेलीकाम सर्किल के रेट्स अलग और एस.टी.डी. व आई.एस.डी. के भी रेट्स अलग अलग थे. कहीं पल्स पंद्रह सेकेंड्स की थी तो कहीं एक मिनट की .अपनी कंपनी के ही दूसरे फोन पर काल करने की दर कुछ और थी , तो अपनी कंपनी से किसी अन्य कंपनी के उपभोक्ता से बातें करने के चार्जेज अलग . विदेश बातें करनी हों तो विभिन्न देशों के लिये भी रेट्स पूरी तरह से भिन्न थे . मैं पूरी तरह कंफ्यूज्ड हो गया था .
इतनी अधिक विविधताओं के बीच चयन करके आज तक मैने कभी भी कुछ नहीं लिया था . बचपन में परीक्षा में सभी प्रश्न अनिवार्य होते थे च्वाइस होती भी थी तो एक ही चैप्टर के दो प्रशनों के बीच , मुझसे ऊपर वाला प्रश्न ही बन जाता था अतः कभी चुनने की आवश्यकता नहीं पड़ी , हाँ चार वैकल्पिक उत्तरों वाले सवालों में जरूर जब कुछ नहीं सूझता था, तो राम राम भजते हुये किसी एक पर सही का निशान लगा देता था . तब आज की तरह ऐंसर शीट पर काले गोले नहीं बनाने पड़ते थे . डिग्री लेकर निकला तो जहाँ सबसे पहले नौकरी लगी ,वहीं आज तक चिपका हुआ हूँ. नेम प्लेट में अपने डिपार्टमेंट का नाम ऐसे चिपका रखा है जैसे सारा डिपार्टमेंट ही मेरा हो . कोई मेरे विभाग के विषय में कुछ गलत सही कहता है ,तो लगता है, जैसे मुझे ही कह रहा हो .मैं सेंटीमेंटल हो जाता हूँ . आज की प्रगतिशील भाषा में मै थोड़ा थोड़ा इमोशनल फूल टाइप का प्राणी हूँ . जीवन ने अब तक मुझे कुछ चुनने का ज्यादा मौका नहीं दिया . पिताजी ने खुद चुनकर जिस लड़की से मेरी शादी कर दी ,वह मेरी पत्नी है और अब मेरे लिये सब कुछ चुनने का एकाधिकार उसके पास सुरक्षित है . मेरे तो कपड़े तक वही ले आती है, जिनकी उन्मुक्त कण्ठ से प्रशंसा कर पहनना मेरी अनिवार्य विवशता होती है .अतः जब सैकड़ों आप्शन्स के बीच श्रेष्ठतम मोबाइल प्लान चुनने की जबाबदारी मुझ पर बरबस आ पड़ी तो मेरा दिग्भ्रमित होना स्वाभाविक ही था .अपना प्लान चुनने के लिये मैने सरकारी खरीदी की तरह कम्पेरेटिव स्टेटमेंट बनाने का प्रयास किया तो मैने पाया कि हर प्लान दूसरे से पूरी तरह भिन्न है और चयन की यह प्रणाली कारगर नहीं है . हर विज्ञापन दूसरे से ज्यादा लुभावना है . मै किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ.
ऐसे सैकड़ों विकल्पों वाले आकर्षक प्लान के निर्माताओं , नव युवा एम.बी.ए. पास , मार्केटिंग मैनेजर्स की योग्यता का मैं कायल हो गया था .मुझे कुछ कुछ समझ आ रहा था कि आखिर क्यों उतना ही शिक्षित होने पर भी , आज के फ्रेश युवाओं से उनके पिताओं को चौथाई वेतन ही मिल रहा है ! मैं हर हाथ में मोबाइल लिये घूम रही आज की पीढ़ी का भी सहज प्रशंसक बन गया हूँ जो सुगमता से इन ढ़ेर से आफरों में से अपनी जरूरत का विकल्प चुन लेती है .
विवेक रंजन श्रीवास्तव