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Dec 24 06 9:35 AM

QUOTE (भारतवासी @ December 22, 2006 12:56 pm)
लिखते-लिखते
पहुँच जाते हैं शब्द
अभीष्ट तक।
अंतहीन अभीष्ट......

बहुत अज़ीब बात है,
कुछ मायनों में
बेदुरूस्त शै भी
क़रीने से ज़्यादा
खूबसूरत और लाज़बाब होती है।
हर बार एक ही
आयोजन व प्रयोजन।
थकने की सोचना भी
वफ़ाई की दीवार है।

रोज़ दराज़ों से निकाल-निकाल कर
ख़्वाब,
सजाता रहता हूँ क़ाग़ज़ी फ़र्श पे।
रंगीन सितारों से जलाता रहता हूँ
आशा और प्रतिआशा का दीया।
सुबह का सूरज
और फिर
रात का चाँद।
हर बार यूँही आते भी हैं
और जाते भी।

दराज़ों का खुलना
और बंद होना भी है
जैसे
अंतहीन अभीष्ट।
अंतहीन अभीष्ट......

BAHUT ACHA LIKHA


AHSAS KO ITANI GAHARAI SE LIKHA HE

DAAD HAJIR HE

SHAKUN PANCHHI LAYE AAS
SHUKOON KA LAYE AHSAS