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Oct 18 07 3:33 PM

वक़्त ने पत्थर कर दिया है मुझको मगर
तुम तराशते क्यों नही मुझे तोड़ते क्यों नही
मैं हां कहूँगी तभी नज़दीक आयोगे
अजीब ज़िद है तुम्हारी ये ज़िद छोड़ते क्यों नही

तुम क्यों सोचते हो मुझको
बुतो का वजूद चाहिए
मुझ को तुम्हारी हां
मेरी ना के बावज़ूद चाहिए

bahut sunder lines hain
aapne naari-man ki thaah ko abhivyakti di hai isme

मुझको तोड़ भी दो अब तराश भी दो
मुझ को प्यार भी दो मुझको प्यास भी दो
क्यों सोचते हो मुझ में अहसास नही है
क्यों सोचते हो बर्फ़ में प्यास नही है
क्यों सोचते हो तुम्हे ई मेरी जुस्तज़ू है
क्यों सोचते हो मुझे तलाश नही है
क्यों सोचते हो बर्फ़ में प्यास नही है

ehsaason ko shabdon me khoob dhaala hai
humesha hi aise achha acha pyara pyara likhte rahiye
shukriya

shalini