#1 [url]

Jun 1 07 2:54 PM

तेरे संग जो दो पल रह लूँ मैं,
मौसम को भी ये भरमाते,
कण-कण में कल-कल जड़ देते,
ध्वनियों को हैं ये मदमाते,
कदमों को तेरे अल्हड़पन दे,
मेरे धैर्य पे हैं ये मुस्काते,
तेरे नयनों में शर्म जगा-
बेशर्म से हैं ये इठलाते ,
मेरे दिल में भर देते फिर ये-
कंपन बहुतेरे, तेरे पग के नूपुर,
दुश्मन हैं मेरे, तेरे पग के नूपुर



Bohat badhiya..........


जब शांत समय को पाकर मैं,
तेरे कानों में कुछ कहता हूँ,
जब हवा चुपके से आती है,
उससे छुप कर मैं रहता हूँ,
फिर तेरी हंसी में जग अपना,
खोता हूँ, उसमें बहता हूँ,
और तेरे बदन में सिहरन को,
अपनी सिहरन से लहता हूँ,
उस पल क्यों, अपने राग में ही-
धुन हैं छेड़े , तेरे पग के नूपुर,
दुश्मन हैं मेरे , तेरे पग के नूपु



Wah...kya baat hai

जब अपनी चाहत के पथ से,
हूँ छांटता अनुचित बातों को,
जब प्रीत से विमुख हर दिल से,
हूँ काटता चोटिल घातों को,
जब रंग सपनों के देता हूँ,
अपने दिन-अपनी रातों को,
जब तेरी बाहों में खोकर,
खोता हूँ अपनी मातों को,
उसपल हीं क्यों रूनझून करते--
उलझन हैं रे, तेरे पग के नूपुर,
दुश्मन हैं मेरे, तेरे पग के नूपुर।



Namaskaar Deepak jee


Dil ki zameen pe likhi pyaar ka sagar chhalkati hui ye khoobsurat rachna jiski tarif karne k liye aaj mere lafz nahi hai..in dino mein padhi sabse alag aur umda kavita aapki..bas yahi dil karta hai ki baar-2 ise gun-gunata rahu...Upar wala aapki kalam ko yuhi roshan rakhe aur hamein aesa hamesha padhne ko milta rahe...


shukriyah aapka is pyaar bhari kavita se ru-b-ru karvane k liye